तेरा साथ है कितना प्यारा-7


(Tera Sath Hai Kitna Pyara -7)

This story is part of a series:

तेरा साथ है कितना प्यारा-1

तेरा साथ है कितना प्यारा-6


व्‍व्वो मैं क्‍्क्कु…छ…नहींईईइ…’ बस इतना ही फूटा मुकुल के मुंह से…
मैं हंसने लगी।

मुकुल मुझसे नजरें नहीं मिला पा रहा था।

मुझे लगा कि अभी शायद यह कुछ नहीं करेगा पर मैं यह भी जानती थी कि यदि आज मुकुल मेरे हाथ से निकल गया तो फिर जल्दी से मौका नहीं मिलेगा, मैं तेजी से अपना दिमाग दौड़ाने लगी।

मैंने ही आगे बढ़ने की ठानी, मैंने वहीं बिस्तर पर पड़ी अपनी पैन्टी को हाथ में उठाकर जानबूझ कर मुकुल की तरफ करके खोला और खड़े-खड़े ही नीचे झुककर पैन्टी को अपनी पैरों में डालने लगी।

इतना झुकने के कारण मेरे गोरे सुन्दर स्तनों की पूरी गोलाई मुकुल के सामने थी और मुकुल मुझसे नजर बचाकर लगातार मुझे ही घूर रहा था, मैं भी मुकुल को पूरा मौका देना चाहती थी इसीलिये जानबूझ कर उसकी तरफ नहीं देख रही थी।

मैंने पूरी तसल्ली से एक एक पैर में पैन्टी पहनकर ऊपर चढ़ाना शुरू कर दिया। मैं मुकुल की हर हरकत पर नजर रख रही थी पर उससे नजरें जानबूझ कर नहीं मिला रही थी।

मुकुल तो बेचारा एसी रूम में भी पसीने से तरबतर हो गया था।

तभी मैंने देखा कि मुकुल का एक हाथ उसकी पैन्ट के ऊपर आया, मेरी निगाह वहाँ गई, वो हिस्सा बहुत मोटा होकर फूल गया था।

मुकुल वहाँ धीरे धीरे हाथ फिराने लगा, मेरे हाथों पर मुस्कुकराहट आने लगी।

अचानक मुकुल वहाँ से उठा और बाथरूम की तरफ दौड़ा पर मैं आराम से अपना काम कर रही थी।

मुकुल के बाथरूम जाने के बाद मैं भी दबे पांव उस तरफ घूमी, मुकुल शायद इतनी तेजी में था कि उसने दरवाजा बन्द भी नहीं किया।

मैंने अन्दर झांका- अन्दर का दृश्य बहुत ही मनोहारी था।

मुकुल टायलेट सीट के सामने खड़ा था उसकी पैंट पैरों में नीचे पड़ी थी और वह अपना लिंग पकड़कर बहुत जोर-जोर से आगे पीछे करके हिला रहा था।

मैं समझ गई कि मुकुल खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाया।

अभी मुझे कुछ और खेल भी खेलना था, मैं वापस घूम कर टावल हटाकर अपनी ब्रा पहनने लगी।

तभी मुकुल बाथरूम से बाहर आया और बोला- यह क्या कर रही हो नयना… कपड़े बाथरूम के अन्दर नहीं पहन सकती थी?

‘कितना छोटा सा बाथरूम है… सारे कपड़े गीले हो जाते, और तू कोई गैर थोड़ा ही है।’ मैंने जवाब दिया।

मेरे गोरे बदन पर काले रंग की ब्रा और पैंटी कहर ढा रही थी, मुकुल लगातार मुझे ही घूर रहा था पर उससे ज्यादा हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

मैंने ही दोबारा बातचीत शुरू की- गर्मी बहुत है ना, देख तुझे तो एसी में भी पसीना आ रहा है।

कहकर मैं फिर से शीशे की तरफ देखकर खुद को संवारने लगी।

मुकुल मेरी तरफ से ध्यान हटाते हुए बोला- नयना, भूख लगी है कुछ खाने को मंगा लेते हैं।

‘हाँ, सैंडविच मंगवा ले।’ मैंने कहा, मैं तो आज खुद मुकुल को सैडविच बनाना तय कर चुकी थी।

उसने सैंडविच आर्डर किया और फिर से कनखियों से मुझे घूरने लगा।

‘कमीना, सिर्फ घूरेगा ही या कुछ और भी करेगा।’ मैं मन ही मन सोच रही थी कि अचानक मुकुल बोला- नयना, मैंने कभी तुमको इतने गौर से नहीं देखा पर तुम सच में सुन्दर हो।

मेरी आँखों में तो जैसे चमक ही आ गई, मैंने मुकुल को और उकसाया- ओहहो, क्या-क्या सुन्दुर लग रहा है मुझमें?

‘सर से पैर तक बिल्कुल अप्सरा हो… तुम्हारे बाल, तुम्हारी आँखें, तुम्हारी गोरी काया, तुम्हारी…’ बोलते बोलते अचानक मुकुल रूक गया।

‘मेरी क्याॽ’ मैंने पूछा।

तभी रूम सर्विस वाला सैन्डविच ले आया। मैं दरवाजे की खटखटाहट सुनकर बाथरूम में चली गई।
मुकुल ने भी सैंडविच लेकर तेजी से दरवाजा बन्द कर दिया।

दरवाजा बन्द होने की आवाज सुनकर मैं बाहर आई, आते ही पूछा- हाँ तो मुकुल बता मेरी क्या…?
अब मुकुल बिल्कुल शरमा नहीं रहा था, मुझसे नजरें मिलाकर भी मुझे घूर रहा था।

मैं समझ गई कि वो थोड़ा बढ़ा है पर अब मुझे भी थोड़ा आगे बढ़ना पडेगा पर अब उसकी नजरें देखकर मुझे भी कुछ शर्म आने लगी थी, मैंने वहीं पड़ी चादर को ओढ़ लिया।

मुकुल बोला- गर्मी बहुत है, और नयना बिना चादर के ज्यादा अच्छी लग रही है।

कहते कहते मुकुल ने खुद ही मेरी चादर हटा दी, मैं अब मुकुल से नजरें नहीं मिला पा रही थी, मैंने हिम्मत करके फिर पूछा- मेरी और क्या चीज अच्छी लगीॽ

मुकुल मेरे बहुत करीब आ चुका था, उसकी गर्म सांसें सीधे मेरे कन्धों पर पड़ रही थी- तुम्हारी से खूबसूरत…

इतना ही बोला मुकुल ने, मेरी टांगें कांपने लगी, थोड़ी देर पहले मैं खुद को शेरनी समझ रही थी अब मुकुल जैसे शेर के सामने किसी बकरी की तरह खड़ी थी।

मुकुल ने मुझे अपनी तरफ खींचा। इधर मुकुल का हाथ मेरे बदन को छुआ… उधर मुझे महसूस हुआ कि शायद मेरी कच्छी भी किसी अनजाने स्राव से गीली हो रही है, मुझे अपनी टांगों के सहारे कुछ टपकता हुआ सा महसूस हुआ।

उफ्फ्फ… कितना सुखद अहसास था।

पर शायद मेरे अन्दर की नारी अब जाग चुकी थी जो मुझे यह सब करने से रोकने लग रही थी। मेरे दिमाग से अब काम करना बिल्कुल बन्द कर दिया था कि मुकुल ने मुझे अपनी बांहों में भर लिया।

‘मम्मुकु…ल… स्‍स्‍स्‍स्‍स्सैंडविच… खा…ले…ठण्‍… ठण्डा हो जायेगा।’ हकलाते हुए मेरे मुंह से निकला।

बस इतना ही बोल पाई थी मैं कि उसके होंठों ने मेरे होंठों को कैद कर लिया, मुकुल की बांहों के बीच फंसी मैं छटपटा रही थी कि मुकुल मेरे गुलाब की पंखुड़ी जैसे होंठों को जैसे चूसने लगा।
मेरे मुंह से बस गग्‍ग्‍्ग्‍… की आवाज निकल पा रही थी।

मुकुल पूरी तसल्ली से मेरे रस भरे होंठों का रस पी रहा था। मुझ पर पता नहीं कैसे नशा सा छाने लगा, अब दिल कर रहा था कि मुकुल मुझे ऐसे ही चूसता रहे। पर चूंकि मुझे विश्वास हो गया था कि अब मुकुल मुझे नहीं छोड़ने वाला तो उससे बचने का नारी सुलभ ड्रामा को करना ही था।

मैं मुकुल को दूर धकेलने का प्रयास करने लगी, पता ही नहीं चला कब मुकुल ने पीछे से जकड़कर मेरी ब्रा का हुक खोल दिया। जैसे ही मैंने मुकुल को दूर हटाने को धक्का दिया, वो दूर तो हुआ पर साथ ही ब्रा भी निकल कर हाथों में आ गई और मेरे दोनों भरे-भरे गुब्बारे उछलकर बाहर निकल गये।

मैं अपने हाथों से उनको छुपाने का प्रयास करने लगी पर मुकुल ने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये, वो एकटक मेरे दोनों स्तनों को देखे जा रहा था। हाययय… माँऽ..ऽ..ऽ..ऽ.. ऽ..ऽ..ऽ… कितनी शर्म महसूस हो रही थी अब मुझे।

कमीना एकटक मेरे दोनों अमृत कलश ऐसे घूर रहा है जैसे खा ही जायेगा।

मुझमें अब उससे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं थी। मैंने लज्जा़ से नजरें नीची कर ली।

मुकुल बिस्तर पर बैठ गया और मुझे अपने पास खींच लिया, अपने सामने खड़ा करके वो मेरे दोनों चुचुकों से खेलने लगा। अजीब सी मस्ती मुझ पर छाने लगी, मेरा अंग-अंग थरथरा रहा था, टांगों में खड़े होने की हिम्मत नहीं बची थी।

पर मुकुल जो आनन्द दे रहा था मैं उससे वंचित भी तो नहीं होना चाहती थी और तभी सीईईईईई… कमीने ने मुझे और नजदीक खींच कर मेरे दायें चुचूक को मुंह में दबा लिया।

‘हाय्य्य्य्य… यह क्या कर दिया जालिम ने… मेरा बदन बिल्कुल भी खुद के काबू में नहीं था, निढाल सी होकर मुकुल के ऊपर ही गिर पड़ी।

मुकुल ने मुझे फिर से बांहों में जकड़ लिया और सहारा देकर बिस्तर पर गिरा दिया।
मेरी आँखें नशे से बन्द हो रही थी।
मुकुल मेरे ऊपर आ गया।

अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था, मैंने भी लता की तरह मुकुल को जकड़ लिया, मुकुल की गर्म-गर्म सांसें मेरे बदन की कामाग्नि को और बढ़ा रही थी। मैं बुरी इस कामाग्नि में जल रही थी।

मुकुल मेरे गुदाज बदन को अपने होंठों से सींचने लगा, मेरे कन्धे, स्तनों, नाभि और पेड़ू को चूसते-चूसते वो नीचे की ओर बढ़ने लगा।

आहहहह… इसने तो एक झटके में मेरी कच्छी भी मेरी टांगों से निकाल फैंकी ! दैय्या रेएएए… जान लेगा क्या यह मेरी?
मैंने कस के चादर को पकड़ लिया, अब रुकना मुश्किल हो रहा था, मेरी टांगें अभी भी बैड से नीचे लटकी थी, वो मेरी दोनों को खोलकर उनके बीच में बैठ गया।

और…आह… मेरी…योनि… हाय…मेरी… मक्खन… जैसी… उफ्फ्फ्… चिकनी… योनि… चाटने लगा।
मैं अपने नितम्ब जोर जोर से हिलाने लगी।
मेरा रस बस टपकने ही वाला था।

उसने तो हद तब कर दी जब योनि के भगोष्ठों को खोलकर जीभ से अन्दर तक कुरेदने की कोशिश कर रहा था पर कामयाब नहीं हो पा रहा था। ‘आहहह… मैं गई…मार…डाला…’ मेरे मुंह से इतना ही निकला और मेरा सारा कामरस निकलकर भगोष्ठों पर चिपक गया।
पर वो तो इसको भी मजे ले लेकर चाट रहा था।

हाँ… मैं जरूर अपने होशोहवास में आने लगी, उसका इस तरह चाटना मुझे अब बहुत अच्छा लग रहा था, उसने दोनों हाथों से मेरे दूधिया स्तनों को दबाकर जीभ की कर्मस्थली मेरी योनि को बना रखा था।

वो एक सैकेण्ड को सांस लेने को भी अपना मुंह वहाँ से हटाता तो मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैंने पर शायद उसको भी आभास हो गया कि एक बार मेरा रस निकल चुका है।

वो पूरा निपुण खिलाड़ी था, कोई भी जल्द बाजी नहीं दिखा रहा था, उसने फर्श पर बैठकर मेरी दोनों टांगों को अपने कंधों पर रख लिया और मेरी दोनों मक्खन जैसी चिकनी जांघों को एक एक करके चाटने लगा।

अब मैं भी उसका साथ दे रही थी, कुछ सैकेण्ड तक जांघों को चाटने के बाद वो खड़ा हुआ और फिर मेरी टांगों को उठाकर मुझे घुमा कर पूरा बिस्तर पर लिटा दिया।

मैं आँखें बन्द किये पड़ी उसकी अगली क्रिया का इंतजार करने लगी।
पर यह क्या… उसका स्पर्श तो कहीं महसूस ही नहीं हो रहा था… कहाँ चला गया।

कहानी जारी रहेगी।